
झारखंड की राजनीति में नया मोड़: पिता का सम्मान, बेटे का विरोध
झारखंड की राजनीति में इन दिनों एक बहुत ही अजीब लेकिन दिलचस्प नजारा देखने को मिल रहा है। राज्य की सड़कों पर उतरे हजारों छात्र एक तरफ तो झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के संस्थापक और राज्य आंदोलन के महानायक शिबू सोरेन के समर्थन में नारे लगा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ उनके बेटे और राज्य के वर्तमान मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की नीतियों का जमकर विरोध कर रहे हैं। यह स्थिति दर्शाती है कि राज्य का युवा वर्ग आज भी ‘दिशोम गुरु’ यानी शिबू सोरेन को अपना आदर्श मानता है, लेकिन वर्तमान सरकार की कार्यप्रणाली से बेहद आहत और नाराज है। छात्रों का कहना है कि जिस झारखंड का सपना शिबू सोरेन ने देखा था, उसे पूरा करने में वर्तमान सत्ता विफल साबित हो रही है। इस विरोध प्रदर्शन ने झारखंड की सियासत में एक नई बहस छेड़ दी है कि आखिर क्यों ‘गुरुजी’ का बेटा युवाओं की उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पा रहा है।
शिबू सोरेन यानी ‘दिशोम गुरु’ का छात्रों के बीच आज भी बड़ा कद
शिबू सोरेन केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि झारखंड आंदोलन की एक ऐसी पहचान हैं जिन्होंने दशकों तक आदिवासियों और मूलवासियों के हक की लड़ाई लड़ी। छात्रों के मन में उनके प्रति जो सम्मान है, वह उनकी वर्षों की तपस्या और संघर्ष का परिणाम है। आंदोलनकारी छात्र जब ‘शिबू सोरेन जिंदाबाद’ के नारे लगाते हैं, तो वे असल में उस विचारधारा को याद करते हैं जिसने अलग झारखंड राज्य की नींव रखी थी। छात्रों का मानना है कि शिबू सोरेन ने शोषकों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी, लेकिन आज राज्य में व्यवस्था ऐसी हो गई है कि युवाओं को अपने ही हक की नौकरियों के लिए सड़कों पर लाठियां खानी पड़ रही हैं। यही वजह है कि प्रदर्शन के दौरान भी छात्र अपने पोस्टर और नारों में शिबू सोरेन की विरासत को ऊंचा रखते हैं, ताकि वे सरकार को यह याद दिला सकें कि वे अपने पूर्वजों के संघर्ष को भूले नहीं हैं।
हेमंत सोरेन सरकार से आखिर क्यों मोहभंग हुआ युवाओं का?
झारखंड के युवाओं की नाराजगी का सबसे बड़ा कारण राज्य की नियोजन नीति और भर्ती परीक्षाओं में हो रही धांधली है। पिछले कुछ वर्षों में जेएसएससी (JSSC) और जेपीएससी (JPSC) द्वारा आयोजित कई परीक्षाएं विवादों के घेरे में रही हैं। पेपर लीक की घटनाओं और भर्ती प्रक्रियाओं में देरी ने छात्रों के भविष्य को अधर में लटका दिया है। छात्र ’60-40 नाय चलतो’ (60-40 की नीति नहीं चलेगी) जैसे नारों के साथ हेमंत सोरेन सरकार की नीतियों को चुनौती दे रहे हैं। उनका आरोप है कि सरकार स्थानीय युवाओं को प्राथमिकता देने के बजाय ऐसी नीतियां बना रही है जिससे बाहरी लोगों को फायदा हो रहा है। यही वह बिंदु है जहां छात्र अपने मुख्यमंत्री से दूरी बना लेते हैं और शिबू सोरेन के उस दौर को याद करते हैं जब जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए आंदोलन हुआ था।
नारों के पीछे का गहरा संदेश और राजनीतिक अर्थ
जब छात्र विरोध प्रदर्शन के दौरान शिबू सोरेन के नारे लगाते हैं, तो इसके पीछे एक गहरा मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक संदेश होता है। वे सरकार को यह बताना चाहते हैं कि हम जेएमएम की मूल विचारधारा के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि हम उस प्रशासनिक विफलता के खिलाफ हैं जो वर्तमान सरकार के दौर में दिख रही है। यह एक तरह का ‘इमोशनल कार्ड’ भी है, जिसके जरिए छात्र सत्ता पक्ष के विधायकों और मंत्रियों को शर्मिंदगी महसूस कराना चाहते हैं। वे कहते हैं कि जिस पिता ने खून-पसीना बहाकर राज्य बनाया, उसका बेटा आज युवाओं को रोजगार देने में नाकाम हो रहा है। यह विरोधाभास राज्य की राजनीति के लिए एक बड़ा संकेत है कि आने वाले समय में युवाओं का वोट बैंक किसी भी तरफ करवट ले सकता है।
बेरोजगारी और भर्ती प्रक्रिया में देरी बनी सबसे बड़ी वजह
झारखंड में बेरोजगारी एक संवेदनशील मुद्दा बन चुका है। हाल के दिनों में उत्पाद सिपाही भर्ती के दौरान हुई कई छात्रों की मौत ने इस आग में घी डालने का काम किया है। छात्रों का कहना है कि सरकार के पास न तो स्पष्ट नियोजन नीति है और न ही युवाओं के भविष्य को लेकर कोई ठोस योजना। कई सालों से रुकी हुई नियुक्तियों के कारण छात्रों की उम्र निकलती जा रही है। परीक्षा की तैयारी में जुटे युवा जब देखते हैं कि परीक्षा से पहले ही पेपर लीक हो गया या नियमों में फेरबदल कर दिया गया, तो उनका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच जाता है। इसी गुस्से का नतीजा है कि वे सड़कों पर उतरकर हेमंत सोरेन के खिलाफ नारेबाजी करते हैं, जबकि शिबू सोरेन के नाम का सहारा लेकर अपनी जड़ों से जुड़ाव महसूस करते हैं।
निष्कर्ष: युवाओं की आवाज और सरकार के लिए बड़ी चुनौती
कुल मिलाकर, झारखंड में ‘पिता से प्यार और बेटे से पंगा’ वाली यह स्थिति सरकार के लिए एक गंभीर चेतावनी है। शिबू सोरेन के नाम पर राजनीति करने वाली पार्टी के लिए यह आत्ममंथन का समय है कि आखिर क्यों उनका सबसे मजबूत वोट बैंक यानी ‘युवा’ आज उनसे दूर जा रहा है। यदि हेमंत सोरेन सरकार समय रहते छात्रों की मांगों को नहीं सुनती और पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया सुनिश्चित नहीं करती, तो केवल ‘गुरुजी’ की विरासत के सहारे चुनावी नैया पार लगाना मुश्किल हो जाएगा। युवाओं को नारों और वादों से ज्यादा अब ठोस परिणाम चाहिए। झारखंड का भविष्य इन छात्रों के हाथों में है, और इनकी नाराजगी आने वाले चुनावों में सत्ता का समीकरण बदल सकती है। सरकार को चाहिए कि वह छात्रों के साथ सीधा संवाद करे और उनके भरोसे को फिर से बहाल करे।शिबू सोरेन, हेमंत सोरेन, झारखंड छात्र प्रदर्शन, JSSC भर्ती विवाद, झारखंड राजनीति