
युवाओं का गुस्सा और सड़कों पर पुलिस की लाठियां
आज देश के अलग-अलग कोनों से एक जैसी तस्वीरें सामने आ रही हैं। चाहे वह झारखंड की राजधानी रांची हो, बिहार का पटना हो या फिर देश की धड़कन दिल्ली। हर जगह छात्र सड़कों पर हैं और बदले में उन्हें मिल रही हैं पुलिस की लाठियां, आंसू गैस के गोले और डराने वाली पुलिसिया कार्रवाई। सवाल यह उठता है कि आखिर हमारे देश का भविष्य कहे जाने वाले छात्रों को अपनी मांगों के लिए सड़कों पर उतरने और चोट खाने पर क्यों मजबूर होना पड़ रहा है? पिछले कुछ महीनों में रांची में जेएसएससी (JSSC) अभ्यर्थियों पर हुआ हमला हो, या पटना में शिक्षक बहाली को लेकर प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर लाठीचार्ज, हर जगह कहानी एक ही है। छात्रों का आरोप है कि सरकारें उनकी समस्याओं को सुनने के बजाय उनकी आवाज को दबाने के लिए बल प्रयोग का सहारा ले रही हैं। यह स्थिति लोकतंत्र के लिए चिंताजनक है।
रांची में जेएसएससी-CGL परीक्षा का विवाद और प्रशासन का रवैया
झारखंड की राजधानी रांची में हाल ही में जो हुआ, उसने सबको झकझोर कर रख दिया। हजारों की संख्या में छात्र जेएसएससी-CGL परीक्षा में हुई धांधली और पेपर लीक के खिलाफ प्रदर्शन करने निकले थे। छात्रों की मांग सरल थी—एक पारदर्शी परीक्षा प्रणाली और दोषियों पर कार्रवाई। लेकिन, उन्हें क्या मिला? पुलिस की बर्बरता। रांची की सड़कों पर छात्रों को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा गया। **छात्रों पर लाठीचार्ज** की इन तस्वीरों ने सोशल मीडिया पर खूब आक्रोश पैदा किया। जब छात्र अपने हक की बात करते हैं, तो उन्हें ‘उपद्रवी’ करार दे दिया जाता है। रांची की इस घटना ने साफ कर दिया कि सरकारी तंत्र संवाद के बजाय दमन की नीति अपना रहा है, जो छात्रों के मानसिक मनोबल को तोड़ने का काम कर रही है।
पटना की गलियों में गूंजती न्याय की मांग और पुलिसिया कहर
बिहार का पटना तो मानो विरोध प्रदर्शनों का केंद्र बन चुका है। यहां कभी बीपीएससी (BPSC) के अभ्यर्थी तो कभी शिक्षक भर्ती के उम्मीदवार अपनी मांगों को लेकर डाकबंगला चौराहे पर जमा होते हैं। पटना में **पुलिसिया कार्रवाई** का आलम यह है कि तिरंगा हाथ में लिए छात्र पर भी लाठियां बरसाने से गुरेज नहीं किया जाता। बिहार में बेरोजगारी की समस्या विकराल है, और जब छात्र नौकरी की मांग करते हैं या परीक्षा कैलेंडर जारी करने की बात कहते हैं, तो उन्हें जवाब में आंसू गैस के गोले मिलते हैं। **पेपर लीक** की घटनाओं ने छात्रों के विश्वास को पूरी तरह हिला कर रख दिया है। महीनों की मेहनत एक झटके में तब बर्बाद हो जाती है जब पता चलता है कि पेपर पहले ही बिक चुका है। ऐसे में छात्र सड़क पर न आएं तो क्या करें?
दिल्ली की सड़कों पर छात्रों का संघर्ष और व्यवस्था की खामियां
देश की राजधानी दिल्ली में भी स्थिति कुछ अलग नहीं है। चाहे वह मुखर्जी नगर हो या ओल्ड राजेंद्र नगर, कोचिंग संस्थानों की लापरवाही और प्रशासनिक उदासीनता के खिलाफ जब छात्र आवाज उठाते हैं, तो उन्हें हिरासत में ले लिया जाता है। दिल्ली में हाल ही में हुई कुछ दुखद घटनाओं के बाद जब छात्र सुरक्षा और बेहतर सुविधाओं की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे, तब भी पुलिस का कड़ा रुख देखने को मिला। **प्रतियोगी परीक्षा** की तैयारी करने वाले छात्र अपनी जिंदगी के सबसे कीमती साल किताबों के बीच बिताते हैं, लेकिन जब सिस्टम उन्हें फेल कर देता है, तो उनका धैर्य जवाब दे जाता है। दिल्ली की पुलिसिया कार्रवाई यह दर्शाती है कि सत्ता के करीब होने के बावजूद छात्रों की आवाज अनसुनी रह जाती है।
आखिर संवाद के बजाय लाठी ही सरकार का सहारा क्यों?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर सरकारें और प्रशासन छात्रों से सीधी बात क्यों नहीं करते? क्यों हर प्रदर्शन का अंत लाठीचार्ज या आंसू गैस के साथ होता है? इसके पीछे एक मुख्य कारण प्रशासन की संवेदनहीनता है। जब भी छात्र बड़ी संख्या में इकट्ठा होते हैं, उसे ‘कानून-व्यवस्था’ की समस्या मान लिया जाता है, न कि एक सामाजिक और आर्थिक समस्या। **बेरोजगारी** की मार झेल रहे युवाओं के पास खोने के लिए कुछ नहीं होता, और जब सरकारें उनकी वाजिब मांगों पर भी चुप्पी साध लेती हैं, तो आक्रोश भड़कना स्वाभाविक है। लाठी के दम पर भीड़ को तितर-बितर तो किया जा सकता है, लेकिन उस असंतोष को खत्म नहीं किया जा सकता जो छात्रों के मन में व्यवस्था के खिलाफ पनप रहा है।पेपर
लीक और सिस्टम की विफलता का गहराता संकट
देशभर में छात्रों के गुस्से का एक बड़ा कारण परीक्षा प्रणालियों का ध्वस्त होना है। **पेपर लीक** आज एक राष्ट्रीय समस्या बन चुका है। यूपी, बिहार, राजस्थान और झारखंड जैसे राज्यों में शायद ही कोई ऐसी बड़ी परीक्षा हो, जो बिना किसी विवाद के पूरी हुई हो। छात्र सालों-साल तैयारी करते हैं, कर्ज लेकर पढ़ाई करते हैं, लेकिन परीक्षा के दिन ही खबर आती है कि पेपर लीक हो गया। यह सिर्फ एक पेपर का लीक होना नहीं है, बल्कि लाखों युवाओं के सपनों का कत्ल है। जब छात्र इस भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाते हैं, तो उन्हें चुप कराने के लिए बल का प्रयोग किया जाता है। सरकार को समझना होगा कि लाठी चलाने से सिस्टम की खामियां नहीं छिपेंगी, इसके लिए ठोस सुधारों की जरूरत है।
निष्कर्ष: समाधान दमन में नहीं, सुधार में है
अंत में, यह समझना जरूरी है कि छात्र कोई अपराधी नहीं हैं, वे अपने भविष्य और अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं। रांची, पटना और दिल्ली की घटनाएं इस बात का प्रमाण हैं कि अब छात्र चुप बैठने वाले नहीं हैं। लाठीचार्ज, आंसू गैस और गिरफ्तारियां केवल अस्थायी समाधान हो सकती हैं, लेकिन लंबे समय में यह आक्रोश और बढ़ेगा। सरकारों को चाहिए कि वे छात्रों के साथ एक पारदर्शी संवाद स्थापित करें, परीक्षा प्रणालियों में क्रांतिकारी सुधार लाएं और भ्रष्टाचार पर कड़ी लगाम कसें। जब तक युवाओं को यह विश्वास नहीं होगा कि उनकी मेहनत का फल उन्हें ईमानदारी से मिलेगा, तब तक सड़कों पर यह संग्राम जारी रहेगा। लोकतंत्र में लाठी का नहीं, बल्कि तर्क और न्याय का स्थान होना चाहिए।छात्रों पर लाठीचार्ज, पेपर लीक, पुलिसिया कार्रवाई, बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षा