नेतन्याहू का बड़ा फैसला: क्या अब कभी नहीं बन पाएगा स्वतंत्र फिलिस्तीन राष्ट्र?
इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने एक बार फिर अपने सख्त तेवरों से पूरी दुनिया को चौंका दिया है। उन्होंने सार्वजनिक रूप से यह घोषणा की है कि जब तक वे प्रधानमंत्री की कुर्सी पर हैं, तब तक एक स्वतंत्र फिलिस्तीन राष्ट्र का निर्माण नहीं होने देंगे। नेतन्याहू का यह बयान ऐसे समय में आया है जब अंतरराष्ट्रीय समुदाय, विशेष रूप से अमेरिका, ‘टू-स्टेट सॉल्यूशन’ (दो-राष्ट्र समाधान) पर जोर दे रहा है। नेतन्याहू ने न केवल फिलिस्तीनी संप्रभुता के विचार को खारिज किया, बल्कि उन्होंने पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस शांति प्लान को भी ठंडे बस्ते में डाल दिया है, जिसे कभी इजरायल के लिए ऐतिहासिक माना जा रहा था।
बेंजामिन नेतन्याहू का रुख और ट्रंप के प्लान की अनदेखी
प्रधानमंत्री नेतन्याहू का मानना है कि एक स्वतंत्र फिलिस्तीन राष्ट्र का निर्माण इजरायल की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा साबित हो सकता है। उनका कहना है कि जॉर्डन नदी के पश्चिम के पूरे क्षेत्र पर इजरायल का सुरक्षा नियंत्रण होना चाहिए। यह शर्त सीधे तौर पर एक संप्रभु फिलिस्तीनी राज्य के अस्तित्व से टकराती है। दिलचस्प बात यह है कि डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल के दौरान आए ‘अब्राहम समझौते’ और उनके शांति प्रस्ताव को नेतन्याहू ने तब समर्थन दिया था, लेकिन अब वे उसे भी अपनी शर्तों पर ही देख रहे हैं। नेतन्याहू का कहना है कि वे सुरक्षा के मुद्दे पर कोई समझौता नहीं करेंगे, चाहे दुनिया का कितना भी दबाव क्यों न हो।
इजरायल-हमास युद्ध और बदलती परिस्थितियां
अक्टूबर में शुरू हुए इजरायल-हमास युद्ध के बाद से मध्य पूर्व की पूरी राजनीति बदल गई है। इस युद्ध ने इजरायल के भीतर सुरक्षा को लेकर डर को और बढ़ा दिया है। नेतन्याहू का तर्क है कि अगर फिलिस्तीन को एक अलग देश की मान्यता दी जाती है, तो वह क्षेत्र आतंकवादियों का गढ़ बन सकता है, जिससे इजरायल की सीमाओं पर खतरा हमेशा बना रहेगा। इजरायल के दक्षिणपंथी गठबंधन की सरकार भी इसी विचारधारा पर चल रही है। नेतन्याहू का यह बयान उनके घरेलू राजनीतिक आधार को मजबूत करने की एक कोशिश भी माना जा रहा है, क्योंकि वे खुद को इजरायल के एकमात्र रक्षक के रूप में पेश करना चाहते हैं।
मध्य पूर्व संकट और वैश्विक प्रतिक्रिया
नेतन्याहू के इस कड़े रुख ने अमेरिका और यूरोपीय देशों के सामने बड़ी मुश्किल खड़ी कर दी है। जो बाइडन प्रशासन लगातार इस बात पर जोर दे रहा है कि युद्ध के बाद का समाधान केवल दो-राष्ट्र सिद्धांत के जरिए ही संभव है। अरब देश भी इसी शर्त पर इजरायल के साथ संबंधों को सामान्य करने की बात कर रहे हैं। सऊदी अरब जैसे महत्वपूर्ण देशों ने स्पष्ट किया है कि जब तक फिलिस्तीन राष्ट्र के निर्माण की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया जाता, तब तक वे इजरायल के साथ रिश्तों को आगे नहीं बढ़ाएंगे। नेतन्याहू के ताजा बयान ने इन कूटनीतिक कोशिशों को बड़ा झटका दिया है।
सुरक्षा का सवाल और भविष्य की राह
इजरायली पीएम का कहना है कि फिलिस्तीन को नियंत्रित करने का मतलब है कि इजरायल के पास सुरक्षा की ‘अंतिम चाबी’ होनी चाहिए। इसका सीधा अर्थ है कि फिलिस्तीन के पास अपनी सेना या पूर्ण हवाई अधिकार नहीं होंगे। इसे फिलिस्तीनी नेता और दुनिया के कई देश ‘गुलामी का नया रूप’ मानते हैं। नेतन्याहू का मानना है कि अतीत में किए गए समझौते, जैसे कि ओस्लो समझौता, इजरायल के लिए आत्मघाती साबित हुए हैं और वे अब वैसी गलती दोबारा नहीं करना चाहते।
निष्कर्ष: क्या शांति का रास्ता बंद हो गया है?
बेंजामिन नेतन्याहू के इस ऐलान ने यह साफ कर दिया है कि निकट भविष्य में स्वतंत्र फिलिस्तीन राष्ट्र की संभावना न के बराबर है। उनके इस रुख से न केवल फिलिस्तीनियों के साथ तनाव बढ़ेगा, बल्कि इजरायल के अपने सबसे पुराने सहयोगी अमेरिका के साथ भी रिश्तों में कड़वाहट आ सकती है। हालांकि, राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं होता, लेकिन नेतन्याहू ने फिलहाल शांति की मेज पर बड़ी दीवार खड़ी कर दी है। अब देखना यह होगा कि डोनाल्ड ट्रंप के दोबारा सत्ता में आने की संभावनाओं के बीच मध्य पूर्व की यह जटिल गुत्थी क्या नया मोड़ लेती है। क्या अंतरराष्ट्रीय दबाव नेतन्याहू को अपना फैसला बदलने पर मजबूर कर पाएगा या फिर मध्य पूर्व में संघर्ष का यह दौर और भी लंबा खिंचता जाएगा? यह आने वाला वक्त ही बताएगा।बेंजामिन नेतन्याहू, फिलिस्तीन राष्ट्र, इजरायल-हमास युद्ध, डोनाल्ड ट्रंप, मध्य पूर्व संकट